Saturday, August 10, 2019



              मासिक लघुकथा टाइम्स (भोपाल) मई २०१८ (बारह पृष्ठ)
               लघुकथा शोध केंद्र भोपाल म.प्र.(वर्ष:१ ,अंक:१ )

           समीक्षा मेरी कलम से ---
सम्पादकीय—( आ.कान्ता रॉय )
           लघुकथा को हमें आकाशकुसुम नहीं बनाना है ---
 जागरूकता के अभाव में भारत की अधिकाँश आबादी ,अंधविश्वास एवं कुरीतियों से जकड़ी हुई है | रूढ़ता पर कुठाराघात करने के लिए लघुकथा औषधि के समान है | लघुकथा टाइम्स , समाचार पत्र , केवल लघुकथा हितों की साधना करना के लिए प्रतिबद्ध होकर काम करेगी |बलराम अग्रवाल अक्सर कहते हैं कि नये प्रयोग होने चाहिए ताकि विधा विकासशील रहे | हमें क्लोन नहीं बनने देना है |”
लघुकथा में मेरे प्रयासों को संबल देने के लिए जो दो मजबूत हाथ सामने आगे बढ़कर आये थे वो, दोनों हाथ डॉ. मालती वसंत जी के थे | लघुकथा शोध-केंद्र का पहला प्रकाशन परिंदे पूछते हैंलघुकथा विमर्श, (लेखक-अशोक भाटिया)  के प्रकाशन दौरान प्रेस काम्प्लेक्स में एक दैनिक अखवार को अपनी सामने छपते देखना ... .....मन को हठात जैसे दिशा मिल गयी थी |अब लघुकथा एवं इसकी महत्ता को जनसामान्य तक पहुंचाना होगा | लघुकथा को हमें आकाश कुसुम नहीं बनाना है, बल्कि हर आंगन में उगने वाली तुलसी बनाना है जो समाज के लिए गुणकारी एवं हितकारी है |

मध्य प्रदेश की लघुकथाएं ---
१.हमारे आगे हिन्दुस्तान (सतीश दुबे )---कुछ भी खाते हैं तो कोई नहीं देखता, पर कुछ भी पहनते हैं तो सब देखते हैं |”  सड़क पर चल रहे पति-पत्नी के बीच की  बातें, इस लघुकथा में बहुत कुछ कह गई |
२.उसका अट्टहास –(संतोष सुपेकर )गीता-कुरान पर हाथ रखकर, जब शपथ ली जाती है तो सत्य को  किसतरह से हमेशा अपमानित होना पड़ता है ... इस    लघुकथा के माध्यम से यही बताया गया है |
 ३.पीली शर्ट वाला—( डॉ. रामबल्लभ आचार्य ), ४. हिस्सा (कविता वर्मा ), ५.अंतहीन सिलसिला (विक्रम सोनी), ६.पेट (पारस दासोत ), ७.त्याग ( अरुण अर्णव खरे )८. केक्टस में फूल (नयना कानिटकर)
९.  समाज का प्रायश्चित्य( संजीव बर्मा सलिल )इस कथा में स्वगोत्री प्रेम  विवाह करने के चलते... नव दम्पति ने गांव वालों से डरकर गाँव छोड़ दिया |  अंतर्राष्ट्रीय खेल स्पर्धा में चयनित होने के कारण, उनदोनों का उसी गाँव में भव्य स्वागत किया गया ...जहाँ कभी, वही गाँव वाले उन दम्पति के जान के दुश्मन बने थे, |
यहाँ मैं  लेखक से कहना चाहूंगी,  कथा में स्वगोत्री (सगोत्री ) विवाह को किसी भी कीमत पर मान्य नहीं दिखाना चाहिए | स्वगोत्री विवाह वैज्ञानिक  दृष्टिकोण के आधार पर ...स्वास्थ के लिए बेहद हानिकारक है |

लघुकथा के विशिष्ट परिंदे ---आ.सुनील वर्मा की उत्कृष्ट लघुकथाएं ---
 १.रिटायरमेंट २. मर्दानी ३. छिलके ४.चुभन ५. चतुर्भुज ६. कोई अपना सा |

लघुकथा  छिलके”—कईबार पढने का बाद भी... मुझे इस लघुकथा के शीर्षक का सही अर्थ समझ में नहीं आया | 

लघुकथा और शास्त्रीय सवाल ---(डॉ. अशोक भाटिया )
 महत्वपूर्ण बातें
वो सिद्धांत जो रचना को बेहतरी की ओर न ले जाएँ या व्यवहारिक न हो व्यर्थ होते हैं | लघुकथा में रचना एक हो सकती है,एक से अधिक भी  और एक भी नहीं |बिम्ब रचना के सौंदर्य में वृद्धि तो करता है लेकिन कई रचनाओं में इसको लाना उसकी गतिशीलता में बाधक बन जाता है |इसलिए  एक घटना और एक बिंब का सिद्धांत कोई मायने नहीं रखता | संवाद स्वंय में रचना का महत्वपूर्ण तत्व है | इससे कई बार बहुत बड़ी बात कही जा सकती है | लेकिन संवादों का होना कोई शर्त नहीं है | संवादों का प्रयोग लेखक व रचना पर निर्भर करता है | लघुकथा में काल को लेकर लेखक पर बंधन नहीं लगाना चाहिए | एक उद्देश्य के हिसाब से लेखक जहाँ जाना चाहेगा जाएगा ही |
श्रेष्ठ रचना तो वो है...जिसमे पाठक की सोच, भावना और संवेदना को सही दिशा में प्रभावित करने की क्षमता हो |
नारी संघर्ष से नारी सशक्तिकरण तक ----( उप-सम्पादक---सुनीता प्रकाश )
समकालीन लघुकथाएं
भीतर का सच,  अस्तित्व की यात्रा,  रक्षक भक्षक और पिता (पूनम डोगरा ) कसौटी (सुकेश साहनी )

भीतर का सच (अशोक भाटिया )---अच्छा एक बात बताओ ...अगर हमारा पहला बच्चा लड़का होता , तो भी क्या दूसरे का बारे में सोचते ? “ इस लघुकथा में पति-पत्नी के बीच का साधारण सा संवाद,...  दिल को छू गई |
अस्तित्व की यात्रा ( आ.कान्ता रॉय) --- उसे कहाँ मालुम था कि समय बीतने पर वह इन्हीं बातों के कारण स्त्री कहलाएगी |” इस लघुकथा में...स्त्री को कमजोर एवं हीन मानने के दृष्टिकोण पर कठोर प्रहार किया गया है |

लघुकथा एक विचार (उप-सम्पादक---गोकुल सोनी )
लघुकथाअपने विचारों को अभिव्यक्त करने का एक श्रेष्ठ और सफल माध्यम है | इसमें सम्प्रेषणशीलता अत्यधिक तीव्र और आडम्बर-मुक्त होती है | कालान्तर में यह रोपित विचार व्यक्ति की निर्णय-क्षमता पर व्यापक प्रभाव डालता है |
लघुकथाएं विदेश से ---मंटो की लघुकथाएं ---(६)
बंटवारा,  करामात,  सफाई पसंद,  हैवानियत,  साम्यवाद,  हलाल और झटका |
शशि बंसल (उप-सम्पादक)
 लघुकथा  देखने में जितनी छोटी और आसान होती है , लिखने में उतनी ही गंभीरता, समर्पण, पैनापन मांगती है | व्यंग्यात्मक लघुकथा की बात करें तो लेखक की जिम्मेवारी और भी बढ़ जाती है | हास्य , जहाँ मनोरंजन प्रदान करता है, गुदगुदाता है, वहीँ व्यंग्य एक ऐसा नुकीला तीर है जो सीधे हृदय और मस्तिष्क में जाकर चुभता है |
१.अपना-पराया( हरिशंकर परसाई ) २.इंसानियत मरी नहीं (विनोद दवे ) ३. इंटरव्यू (मधुकांत)  ४.स्वप्नभंग (अशोक बर्मा )---- सभी व्यंग्य लघुकथाओं पर शशि बंसल की बेबाक टिप्पणी पढने को मिला |
 (डॉ. मालती बसंत  )---
लघुकथा हिंदी साहित्य में वामन अवतार है |  मन की वृहद संवेदनाओं के क्षणों का बृहद रूप है | यह मानव जीवन की क्षणों की व्याख्या है | इसलिए जीवन के यथार्थ का अधिक निकट है | जैसे परमाणु में ब्रह्माण्ड...पानी की एक बूंद में पूरा समुद्र समाया होता है |

           पहली हिंदी लघुकथाएं ( बलराम अग्रवाल )
पहली लघुकथा होने की दौड़ मे बहुत सी पुस्तकों को सूचीबद्ध किया गयाहै...जिसमें---
अंगहीन धनी (परिहासिनी,१८७६ )भारतेंदु हरिश्र्चंद्र --का पहला स्थान है |
अद्भुत् संवाद ( परिहासिनी,१८८६ )   ,,       --का दूसरा स्थान है |
वस्तुतः ये दोनों  ही रचनाएं भारतेंदु की प्रतिभा और देश-काल सापेक्ष जीवन-दृष्टी की गहराई को प्रस्तुत करती हैं| जहाँ अंगहीन धनी  गंभीर कथा है...वहीं अद्भुत् संवादमें मखरेपन है |

 जया आर्या (उप-सम्पादक)---- लघुकथा पढने वालों के लिए नशा है, लिखने वालों के लिए कर्तव्य बोध | लघुकथा हठात जन्म लेती, अक्सात जन्म लेती है |
               आर्यावर्त से --------
  लघुकथाएं---
संवाद (आभा सिंह) ,मुक्ति मार्ग(अशोक जैन ) ,तब क्या होगा ?(अशोक शर्मा भारती),   अपना-अपना नशा ( सुभाष नीरव) ,बिरादरी की दुख( कुमार नरेंद्र )  फटी चुन्नी (सत्या शर्मा कृति ) ,मिठाई( डॉ.नीना छिब्बर ) , घरोंदा (शोभना श्याम) ,अनावरण ( डॉ.उपमा शर्मा), इतनी दूर(डॉ.कमल चोपड़ा ) ,अभावों के रंग(अशोक मनवानी ),  हिस्से का दूध(मधुदीप ) , नशे(कमलेश भारतीय ) गिद्ध(श्याम सुंदर अग्रवाल) , कीमती पल (प्रेरणा गुप्ता ) , हवा के विरुद्ध(डॉ. शील कौशिक ), मूल्यांकन((डॉ.सूर्यकांत नागर ) ,पाप और प्रयाश्चित(बलराम) अप्रत्याशित(डॉ.शकुन्तला किरण) , जगमगाहट(डॉ.रूप देवगुण ), ऊंचाई( रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’ , वैशाखियों के पैर( भागीरथ ), विश्वाश(युगेश शर्मा ), अल्टीमेट गोल(चित्रा राणा राघव), देश बिकाऊ है( डॉ.मोहन आनन्द तिवारी ) , शनिदेव की माँ (डॉ.वर्षा ढोबले ) (, नजरिया(ओम प्रकाश क्षत्रिय प्रकाश) , हार-जीत(कपिल शास्त्री ) , मदरस डे(अरुण कुमार गुप्ता ) , समझ पाने की समझ (चंद्रा सायता ), कथनी और करनी( ज्योति शर्मा ) , फिर आएगा नया साल ( पूर्णिमा वर्मन ) ,स्मार्ट (डॉ.कुमकुम गुप्ता ) 
मुक्ति मार्ग (अशोक जैन )---“दीपक की लौ के साथ अंधकार की लड़ाई चल रही  है...  पतिंगे उस लौ के प्रति आकर्षित हो रहा है | आखिरकार , हवा.. पतिंगे को जलने से बचाने में सफल हो जाता है | सरल भाव से लिखी गई बेहद सुंदर लघुकथा है | 

२.तब क्या होगा ? (अशोक शर्मा भारती’ ) – ‘जब किसी के बेटी का अपहरण होता है...मोहल्ले वाले सब कुछ देखते हुए भी खामोश रह जाते हैं| समसामयिक घटना पर लिखी गई ... संवेदनशील , बेहद प्रभावशाली लघुकथा है |

लट उलझी सुलझा जा ---(बंधू कुशावर्ती )
 मैं अपना मत समझा दूँ कि लघुकथा का हमारे भारतीय वाकम्यसे नाभि-नाल का सम्बन्ध है | मेरे इस कथन का यह मतलब नहीं कि हिंदी लघुकथा की जड़ों और उत्स को वेदों और पुरानों में ही खोजने का मैं समर्थक हूँ | हाँ, यह भी एक  स्रोत है |”
डॉ. सूर्यकांत नागर लघुकथा में लोक मांगलिक चेतना होना जरूरी है | लघुकथा को किसी नियमावली में नहीं बांधा जा सकता | शिल्प के स्तर पर निरंतर प्रयोग हो रहे हैं, और प्रयोग से ही प्रगति होती है |
(मैं नागर जी की इन बातों से बेहद प्रभावित हुई |)

 पंजाब का लघुकथा संसार ----(श्याम सुंदर अग्रवाल )
लघुकथा को हिंदी पंजाबी में मिन्नी कहाणीके रूप से जाना जाता है | पंजाबी लघुकथा के उन्नयन के लिए वर्ष १९८८ में एक मंच का गठन हुआ | त्रैमासिक पत्रिका मिन्नीका प्रकाशन भी इसी वर्ष हुआ है | पत्रिका मिन्नी की और से हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन का आयोजन किया जाता है | अब तक ऐसे २६ लघुकथा सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं |

लघुकथा और सांझा संकलनों की महत्ता ----(डॉ.उपमा शर्मा )
आने वाला समय निश्चित ही लघुकथा का होगा | दृष्टीअर्धवार्षिक लघुकथा  पत्रिका में शकुन्तला किरण का साक्षात्कार ---बहुत उज्ज्वल ! आज लघुकथा को लेकर जगह-जगह प्रतियोगिता हो रही है | ..........भले ही वो किसी धुन में हो रही हो, हलचल तो हो रही है |
 पुस्तकों की बातें ---दृष्टि’ (महिला लघुकथाकार अंक ) -सम्पादक, आ.अशोक जैन ,अतिथि सम्पादक- आ. कान्ता रॉय |
 आ.पवन जैन सर-- की बेहतरीन समीक्षा पढ़कर, मैं बेहद प्रभावित हुई | उन्होंने सभी रचनाकारों की कथा पर टिपण्णी करके उनका मनोबल बढ़ाया है, वो काबिलेतारीफ है तथा रचनाकारों के प्रति उदारता का परिचय भी |
इस पत्रिका में बलराम अग्रवाल जी ने ८८ सन्दर्भ पुस्तकों , संकलनों एवं पत्रिकाओं से खोज ५८९ महिला कथाकारों की सूचि बनाने का श्रम साध्य कार्य किया है |यह शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हो गया है |
 डॉ. अशोक भाटिया जी ने हिंदी में लेखिकाओं का लघुकथा संसारमें १४६ विभिन्न महिला लघुकथाकारों की रचनाओं से परिचित कराया है , जो अपने आप में एक विशद कार्य है | महिला की रचना धर्मिता को देख कर अंततः उन्होंने कहा कि, इक्कीसवीं सदी में महिला लेखन की जोरदार दस्तक एक बड़ी घटना है , जो भविष्य की लघुकथा पर निश्चय ही बड़ा प्रभाव छोड़ेगी |”

लघुकथा के आयाम---(मुकेश शर्मा ) लघुकथा साहित्य के लिए बहुत जरूरी किताब
मनुष्य अब युगों  का सुख क्षणों में पा लेना चाहता है, इसलिए लघुकथा भी  समय की मांग है|अतः साहित्य में इसका स्थान स्थायी रूप से रहेगा |”
(विष्णु प्रभाकर)
लघुकथा मानव की  संवेदना , उसकी दिकभ्रमिता, उसके टूटन बिखराव आदि को प्रस्तुत करने की सूक्ष्म से सूक्ष्मतर यथार्थवादी कला है |”
 ( पद्म श्री दादा रामनारायण उपाध्याय )
 महिमा वर्मा (उप-सम्पादक )---मन को झकझोरती इस नन्हीं-सी विधा को भले ही आज इतनी प्रसिद्धि मिली हो, पर छोटी कथा के रूप में लघुकथा नें भी प्रारम्भ से ही अपना स्वरूप कर लिया था |
                         धरोहर
१.एक टोकरी-भर मिटटी ( माधवराव स्प्रे )-- गरीब विधवा और जमींदार के ऊपर लिखी गई बेहद संवेदनशील , लंबी लघुकथा है |
२.बंद दरवाजा (प्रेमचंद)---छोटे बच्चे के मनोभाव को सहजता से दर्शाती अनुपम  रचना है | प्रेमचंद हमारे हिंदी साहित्य के अद्भुत सितारे क्यों माने जाते हैं...सच में उनकी रचना को पढने के बाद ही पता चलता है |
३.आम आदमी ( शंकर पुणताम्बेकर ) नेता अपने भाषण के द्वारा आम आदमी को किसतरह से प्रभावित कर लेता है , इस लघुकथा में यही दर्शाया गया है |
४.उंचाई (खलील जिब्रान )---मात्र चार पंक्तियों की यह बेहद प्रभावशाली लघुकथा है |

इस लघुकथा टाइम्स में प्रकाशित सभी लघुकथाओं को पढकर, मैंने बहुत कुछ सीखा और समझा... उसके लिए सभी रचनाकारों का दिल से आभार व्यक्त करती हूँ | सभी नवोदित लघुकथाकारों को यह लघुकथा समाचार पत्र जरुर पढ़ना चाहिए | खासकर, मैं आ. कान्ता रॉय जी के अथक परिश्रम व लगन के प्रति तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ... दिल से आभार, अभिनंदन और साधुवाद |
                         
                       क्षमा सहित, सादर--

                        मिन्नी मिश्रा /पटना
                         २१ .१२.२०१८

  
          
               








                   











समीक्षा मेरी कलम से ---
 
                          परिंदे पूछते हैं
लघुकथा के परिंदे समूह में परिंदों द्वारा अतिथि दिवस के अवसर पर डॉ. अशोक भाटिया से पूछे गये प्रश्न ही इस पुस्तक के होने का कारण बना है | इस पुस्तक का उदेश्य हर नवलेखक को संस्कारित करना है |नवलेखकों के द्वारा पूछे गये सभी प्रश्नों को जवाब और साथ में पचीस लघुकथाओं को उदाहरण देकर इन बातों को समझाया गया है |
आ. काँता रॉय जी, जो लघुकथा परिंदेकी समर्पित संचालक हैं-- के बारे में आ. डा. मालती बसंत जी का कहना है कि, कांता रॉय जैसी लेखिका सदियों में एकबार होती है वह  लघुकथाके रूप में इतनी रची-बसी है जैसे मीरा के जीवन में कृष्ण थे |

 इस पुस्तक की निम्न बातें मुझे अच्छी लगी ---
१.लघुकथाएं यदि विषय की मांग के अनुसार लम्बी हो रही है, तो उन्हें जान-बुझकर छोटा मत करें | रचना की मांग को , उसकी पूर्णता को देखें | आकार को भूल जाएं|
२.छोटे  आकार की लघुकथाओं का एक सांचा नये लेखकों के मन में बन गया है, वह बड़ा गलत है , सृजन का शत्रु है |
३. आप सोच रहे हैं कि लघुकथा रहेगी या कहानी हो जायेगी ...इस सबसे पहले रचना होना है , बाकी सब गौण है  | रचना जो सन्देश देती है , वह  पाठक की  चेतना के द्वार पर दस्तक देती है ...ये जरुरी है | कथानक (विषय वस्तु) और कथ्य (उदेश्य) पर ध्यान दें |
४. सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने कहा, रचना कहानी पथ पर जाती है तो जाने दें, रचना बन जायेगी तो पता चल जाएगा कि वह लघुकथा है...या कहानी है | 
५. उन्हीं के अनुसार , नये लेखक पुराने लेखक को पढ़ते नहीं | पढने से पाठक ही नहीं लेखक भी समृद्ध होते हैं | वास्तव में अच्छा पढने की जरूरत है ...इसके बिना अच्छा लिख ही नहीं सकते |
६.  पंजाबी साहित्यकार,’ डॉ. जोगिन्दर सिंह निराला  के अनुसार रचना में सतही रूप से सन्देश न देकर ,परोक्ष रूप से सन्देश देना आवश्यक है |
७. पहले लेखक को अपनी मानसिकता को उदार बनाना होगा , तभी उसे कलम पकड़नी चाहिए |
८. शीर्षक की जहाँ तक बात है..यह लेखक के कौशल पर निर्भर करता है | कई बार शीर्षक पढ़कर ही पाठक रचना की और खिंचा चला आता है |
९. रचना यथासंभव बड़े से बड़े पाठक-वर्ग को ध्यान में रखकर लिखनी चाहिए |
१०. लघुकथा के लिए तंज अनिवार्य नहीं है ...हाँ लघुकथा चिंतन के लिए मजबूर कर दे, यह एक आवश्यक गुण है |
११. लिखते समय रचना को किसी वर्ग की रचना बना सकें तो उसकी ताकत और  असर बहुत बढ़ जायेंगे |

१२. जब रचना एक उदेश्य को लेकर लिखी जायेगी ,तो कालखंड दोष का कोई मतलब नहीं रह जाएगा | काल निरंतर प्रवाहमान होता है | एक क्षण की रचना कहकर हम ही लघुकथा को बौना बना रहे हैं | लघुकथा में पूरा जीवन समा सकता है...कौशल चाहिए |
१३.यदि  लघुकथा में पंचलाइन अनिवार्य हो जाए, तो सारी की सारी लघुकथा पर दबाब आ जाएगा |
१४. व्यंगात्मक शैली का यथावश्यक प्रयोग लघुकथा को नई धार , नई शक्ति प्रदान करता है |
१५. लघुकथा में क्षेत्रीय भाषा कथा को जीवंत और स्वभाविक बनाता है |
१६. बिम्ब यानि एक दृश्य के माध्यम से कहानी को प्रस्तुत करना और प्रतीक यानी संकेत --- रचना में गहरा अर्थ भरते हैं | यह कथा की ऊँचाई भरता है |

                               क्षमा सहित ----
                                       मिन्नी मिश्रा /पटना
                                         २. १० . १८


Thursday, July 25, 2019


संस्कृत शिक्षा की आवश्यकता क्यों है?

संस्कृत में सतरह सौ धातुएँ, सत्तर प्रत्यय, अस्सी उपसर्ग हैं | इनके योग से बनने वाले शब्दों की संख्या सत्ताईस लाख से अधिक है | यह सबसे वैज्ञानिक भाषा भी है |
आज यह आरोप लगाया जाता है कि संस्कृत जन सामान्य की भाषा नहीं बन सकती है | लेकिन हजारों वर्ष पूर्व के पाणिनि के अष्टाध्यायीसे ज्ञात होता है कि संस्कृत उस समय जन सामान्य और बाजार की भाषा थी | सामाजिक आवश्यकताओं के कारण संस्कृत का मानकीकरण हुआ और यह सम्पूर्ण भारत की सूत्र भाषा बनी | विविध संस्कृति और भाषा वाले देश को सदियों तक एक सूत्र में बांधे रखने का श्रेय संस्कृत को है |

शिक्षा का एक उद्देश्य देश की अखंडता को बनाये रखना तथा मजबूत करना है | इस मापदंड पर संस्कृत पूरा खड़ा उतरती है | इसलिए भारत में संस्कृत शिक्षा की महती आवश्यकता है |
अंग्रेजी ने सभी भारतीय भाषाओँ को बहुत क्षति किया है | अंग्रेजी के A से Z तक के वर्णों को किसी तार्किक आधार पर व्यवस्थित नहीं किया गया है | इसके पीछे कोई विशेष कारण नहीं है कि F... G से पहले क्यों आता है या p...Q से पहले क्यों आता है?
दूसरी तरफ संस्कृत में स्वर अ, , ,ई आदि को मुख के आकार के आधार पर व्यवस्थित किया गया है | अ और आ का उच्चारण गले से, इ और ई का उच्चारण तालू से, उ और ऊ का उच्चारण ओठों से होता है | इसी तरह से व्यंजनों को भी वैज्ञानिक तरीके से जमाया गया है| क वर्ग का उच्चारण गले से, च वर्ग का उच्चारण तालू से, त वर्ग का उच्चारण दांतों से, प वर्ग का उच्चारण ओठों से होता है | संस्कृत के आलावा संसार के किसी और भाषा के वर्णों को इस तरह से तार्किक और वैज्ञानिक रूप से नहीं संरचित किया गया है |अन्य सभी भाषाओँ में त्रुटि है ...पर संस्कृत में कोई त्रुटि नहीं है |
स्वंतंत्र भारत के संविधान में जिस पंथ निरपेक्षता का प्रमुख स्थान है, वह संस्कृत के प्रभाव को ही इंगित करता है | यह वैश्विक पटल पर भारत की मेधा की दुंदुभि बजा सकता है |
वैदिक काल से ही गणना और रेखागणित के गंभीर सिद्धांतों पर चर्चा हो रही है |अंकगणित में ---भास्कर,ब्रह्मगुप्त और महाबीर; रेखागणित में--- बौधायन और परमेश्वर; त्रिकोणमिति में--- माधव आदि उल्लेखनीय हैं | ‘ पाईके मूल्य के सम्बन्ध में महाबीर नामक गणितज्ञ ने सबसे पहले नवीं सदी में गणना की थी | कणाद का परमाणु सिद्धांत ईसा से भी पहले का है |
इसके अतिरिक्त रसायन शास्त्र, धातु विज्ञान, शल्य चिकत्सा,आयुर्वेद अदि से सम्बंधित ग्रंथों की श्रृंखला है| इसके ग्रन्थ यथा चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, बागभट्ट संहिता अदि प्राचीन भारतीय मनीषा के वैज्ञानिक अध्ययन की विस्मयकारी निधि है |
अभियांत्रिकी के क्षेत्र में-- तंजोर,मदुरई,कोणार्क,खजुराहो आदि मेधा की पराकाष्ठा है | संस्कृत में सभी क्षेत्रों के ज्ञान विज्ञान समाहित है | इसलिए आवश्यक है कि सभी प्रकार के लोगों की पहुँच संस्कृत तक हो ताकि इस ज्ञान को सुरक्षित भी किया जा सके और इसका उपयोग देशहित में किया जा सके | विदेश के कई बड़े विद्वान संस्कृत के अनुपम और विस्तृत साहित्य को देखकर चकित हैं |
संस्कृत भाषा के विभिन्न स्वरों और व्यंजनों के विशिष्ट उच्चारण स्थान होने के साथ प्रत्येक स्वर और व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के सात ऊर्जा चक्रों में से एक या अधिक चक्रों को प्रभावित कर शरीर को ऊर्जीकृत करता है |
प्रत्येक शब्द स्वर एवं व्यंजनों की विशिष्ट संरचना है जिसका प्रभाव व्यक्ति की चेतना पर स्पष्ट परिलक्षित होता है | इसलिए कहा गया है कि व्यक्ति को शुद्ध उच्चारण के साथ-साथ बहुत सोच समझ कर बोलना चाहिए |
संस्कृत एक स्वविकसित और संस्कारित भाषा है | इसको संस्कारित करने वाले महर्षि पाणिनि,महर्षि कात्यायन,महर्षि पतंजलि अदि हैं |
भारतीय शिक्षण शैली को समाप्त करने के बाद मैकाले’ ( ब्रिटिश शिक्षाविद्) द्वारा भारतीयों से भारतीयता को नष्ट करने का जो कुचक्र रचा गया, हम उसमे बुरी तरह फंस गए | फलस्वरूप तथाकथित आधुनिक या अंग्रेजी भाषी शिक्षा पद्धति से शिक्षित लोग अज्ञानतावश संस्कृत को सिर्फ पूजा पंथ और कर्मकांडों की भाषा समझ कर इसे अवैज्ञानिक और अनुपयोगी मानने लगे |
जबकि वास्तविकता यह है कि यह मात्र साहित्य, अध्यात्म और दर्शन तक ही सिमित नहीं है अपितु गणित, विज्ञान, औखधि, चिकित्सा, इतिहास, मनोविज्ञान, भाषा विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान अदि में भी महत्वपूर्ण है |
अब तो आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटर क्षेत्र में भी संस्कृत के उपयोग की संभावनाओं पर पश्चिमी जगत में शोध किये जा रहे हैं | अपनी सुस्पष्ट और छंदात्मक उच्चारण प्रणाली के चलते संस्कृत को स्पीच थेरेपी टूल के रूप में मान्यता मिल रही है | |
वर्तमान यूरोपीय भाषाएँ बोलते समय जीभ और मुँह के कई हिस्सों का... और लिखते समय अँगुलियों की कई हलचलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है |
फ़ोर्ब्स पत्रिका १९८५ के अनुसार... दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है | नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार अंतरिक्ष यात्री को संवाद भेजने में वाक्य के उलट पलट हो जाने के चलते अर्थ ही बदल जाता है| लेकिन ऐसा संवाद संस्कृत में भेजने पर अर्थ नहीं बदलते हैं क्योंकि संस्कृत के वाक्य उलट पुलट होने पर भी अपना अर्थ नहीं बदलते हैं |
अनेक भारतीय वैज्ञानिकों को अनुसन्धान की प्रेरणा संस्कृत से मिली | जगदीश चंद्र बासु,चंद्र शेखर वेंकट रमन, आचार्य प्रफुल्ला चंद्र राय, डा मेघनाद सहा जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिक अपनी खोज के लिए संस्कृत को आधार मानते थे | आचार्य प्रफुल्ला चंद्र राय विज्ञान के लिए संस्कृत शिक्षा को अनिवार्य मानते थे | जगदीश चंद्र बसु ने अपने अनुसंधानों के स्रोत संस्कृत में खोजे थे |
वर्तमान समय में भौतिक सुख सुविधाओं के बावजूद मनुष्य सामान्यतः अवसाद,तनाव, चिंता और विभिन्न प्रकार की बिमारियों से ग्रस्त है |सिर्फ भौतिक उन्नति से मानव का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है, इसके लिए आध्यात्मिक उन्नति अत्यन्त जरुरी है | मानव स्वास्थ्य के लिए संस्कृत एकउपयोगी भाषा है |
                                    मिन्नी मिश्रा / पटना
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